पता नहीं मैं पी रहा हूँ या जी रहा हूँ,
इतना दर्द है अंदर, भुलाने को पी रहा हूँ।
ये तन्हाइयाँ, ये भीगी-भीगी सी रातें,
हर तरफ़ बस तेरी ही आती हैं बातें,
भुला न सका वो पल, वो मुलाक़ातें,
हर घूँट में क्यों फिर वही बरसातें।
काश तेरी चालों का अंदाज़ा होता,
दिल यूँ ही न तेरे पीछे रोता,
तेरी बहकी-बहकी सी बातों का असर,
दिल में है अभी भी घुला हुआ ज़हर।
दिल टूटे तो आवाज़ भी आती नहीं,
ज़ख़्म ऐसे हैं, काम दवा की आती नहीं,
हँसता हूँ मगर अंदर से रो रहा हूँ,
ज़िंदगी से हर ख़ुशी खो रहा हूँ।
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